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NNIJAS-2026-8507 General Studies Volume - 2 - Issue 1

21वीं सदी के हिंदी साहित्य में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणा वैश्वीकरण, सांस्कृतिक चेतना एवं समकालीन चुनौतियों के संदर्भ में

मारूत | Co-Authors: प्रोफे. (डॉ.) दिग्विजय कुमार शर्मा

Abstract

इक्कीसवीं सदी के हिंदी साहित्य में राष्ट्र और राष्ट्रीयता की अवधारणा एक व्यापक, बहुआयामी और निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया के रूप में सामने आती है। यह केवल भौगोलिक सीमाओं या राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि सांस्कृतिक, सामाजिक और मानवीय मूल्यों से गहराई से जुड़ गई है। समकालीन हिंदी साहित्य में राष्ट्र को एक स्थिर इकाई के रूप में नहीं, बल्कि विविधताओं से निर्मित एक जीवंत संरचना के रूप में देखा जाता है, जिसमें विभिन्न जातियाँ, भाषाएँ, संस्कृतियाँ और वर्ग अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं। इस प्रकार राष्ट्र की परिभाषा अब अधिक समावेशी और बहुलतावादी हो गई है, जो समाज के हर वर्ग की भागीदारी को महत्व देती है। राष्ट्रीयता की अवधारणा भी इस समय में नए रूप में विकसित हुई है। अब यह केवल देशभक्ति की भावना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें एक जागरूक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण भी शामिल हो गया है। हिंदी साहित्यकार यह स्पष्ट करते हैं कि सच्ची राष्ट्रीयता अंधभक्ति नहीं, बल्कि समाज के भीतर मौजूद असमानताओं और अन्याय के प्रति संवेदनशीलता है। दलित, स्त्री, आदिवासी और अन्य वंचित वर्गों की आवाज अब राष्ट्रीय विमर्श का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है। इससे राष्ट्रीयता का स्वरूप अधिक लोकतांत्रिक और मानवीय बनता है, जिसमें समानता, न्याय और स्वतंत्रता के मूल्यों को प्रमुखता दी जाती है। इस प्रकार राष्ट्रीयता अब एक जिम्मेदारी के रूप में भी देखी जाती है, जो नागरिकों को अपने समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायी बनाती है।

Keywords
बीज शब्द राष्ट्र अवधारणा राष्ट्रीयता वैश्वीकरण सांस्कृतिक विविधता सामाजिक समावेशन
Article Information
Primary Author मारूत
Affiliation संस्कृति विश्वविद्यालय मथुरा
DOI https://doi.org/10.5281/zenodo.21317153
Page Numbers 92-99
Publication Date 15 Aug 2026
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