Abstract
वैचारिक शक्ति के फलस्वरूप ही रचनात्मक व सृजनात्मक शक्ति का विकास होता है जो कि किसी भी राष्ट्र के लिए आवश्यक है। सृजनात्मक व रचनात्मक शक्ति से राष्ट्र एवं समाज को नवाचार का प्रोत्साहन मिलता है। वर्तमान युग में छात्र भी मानसिक द्वंद, अस्पष्ट लक्ष्य, विभिन्न विचारधाराओं के बीच सृजनात्मक व रचनात्मक प्रवृŸिा खो रहा है। जे0 कृष्णमूर्ति जी के अनुसार जहाँ द्वंद है वहाँ सृजनशीलता असंभव है। राष्ट्र के विकास व समाज में बेहतर समन्वय, संतुलन, सृजनात्मक व रचनात्मक रहने के लिए एकाग्र होना आवश्यक है। आचार्य अरविन्द जी ने छात्रों को संबोधित करते हुए कहा है कि तुम जीवन में चाहे कुछ भी करना चाहो, एक चीज एकदम अनिवार्य है और हर चीज के आधार में है, वह है ध्यान के एकाग्र की क्षमता। शिक्षा-व्यवस्था के निजीकरण की अवधारणा के विकसित होने के साथ ही निजी विश्वविद्यालयों, महाविद्यालयों, इण्टर कॉलेजों और पब्लिक स्कूलों की संख्या भी देश में तेजी से बढ़ी है। शिक्षा के निजीकरण ने जहाँ एक ओर ज्ञान की सुलभता के अवसरों की वृद्धि की है, वहीं दूसरी ओर शिक्षण-प्रशिक्षण प्रविधियों, शिक्षा के क्षेत्र में तकनीक के अनुप्रयोगों, कक्षाओं के स्वरूप बदलावों, सूचनाओं की असीमित उपलब्धताओं और व्यावहारिकताओं को बढ़ावा दिया है।